राजेन्द्र कानूनगो 
अधिमान्य पत्रकार

सुप्रीम कोर्ट - चुनाव और रेवड़ी 

रेवाड़ी कल्चर पर मैंने पहले भी लिखा है और कई चैनलों में डिबेट में जुड़कर इस कल्चर पर अपना मत व्यक्त किया है। आज सुप्रीम कोर्ट ने इस कल्चर पर अपना मत व्यक्त किया है जो अत्यंत सराहनीय और कहा जाए तो सबसे ज्यादा देश के हित में है। प्रदेशों के हित में है, साथ ही देश की अर्थव्यवस्था के भी हित में है। इसके अतिरिक्त यदि हम कहें तो देश के निवासियों को एक प्रकार से ऐसा मेहनतकश बनाना है कि वह काम करने के प्रति लापरवाह ना हो जाए। क्योंकि उनको ज्ञात है कि हमको इतने इतने किलो राशन और इतनी राशि तो मुफ्त में मिल ही जाएगी, तो हम फिर काम क्यों करें ? इसी के साथ यदि हम कहें तो देश के ऊपर यह सब कुछ मुफ्त बांटने पर कितना कर्ज होता जा रहा है, यह भी एक विचारणीय प्रश्न है। अब यदि हम इस कर्ज की बात करें, तो कर्ज पर ब्याज को चुकाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है। अच्छी तरह से पाठकों को याद होगा कि मनमोहन सिंह जी जो कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री रह चुके हैं अब वह इस दुनिया में नहीं हैं, परंतु उनका एक वाक्य यहां पर कहना समीचीन होगा कि "पैसे पेड़ पर नहीं लगाते हैं"। लेकिन आज की राजनीति कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि उसमें ऐसा प्रतीत होता है राजनीतिक दलों को यह एहसास हो चुका है कि पैसे वास्तव में पेड़ पर ही लग रहे हैं। और वह पेड़ "जनता की एकमात्र जेब है"। क्योंकि जो भी मुफ्त बांटने में पैसा खर्च हो रहा है वह सरकार आम आदमी की जेब से ही तो वसूल करेगी। लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि जो कुछ हमें मुफ्त में मिल रहा है, उसके बदले में हम कितना कुछ अपने जेब से दूसरे प्रकार से चुका रहे हैं। क्योंकि महंगाई बेतहाशा बढ़ रही है। अब जो ऐसा वर्ग है, जिसे रेवड़ी के रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं हो रहा है, वह एक प्रकार से अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है । अभी भी ज्यादा कुछ बिगड़ा नहीं है सरकार यदि गंभीरता से विचार करें और राज्य सरकारों को सुप्रीम कोर्ट की टीप को ध्यान में रखते हुए यह निर्देश जारी करे कि अब बहुत हुआ जो भी ऐसी योजनाएं हैं, जो मतदाताओं को मुफ्त बांटकर लुभाई जाने की है, उनको तत्काल प्रभाव से बंद किया जाना चाहिए। पता नहीं सुप्रीम कोर्ट जो कह रही है, इससे राजनीतिक दलों को कोई फर्क पड़ने वाला है अथवा नहीं ? परंतु यदि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी है तो केंद्र और राज्य सरकारों को निश्चित रूप से इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए।